परियोजनाएँ

अन्नपूर्णा

खाद्य वितरण

“भूख की कोई पहचान नहीं होती और भूखा भोजन के सिवा कोई पहचान नहीं चाहता”—इस मूल सिद्धांत के साथ परियोजना “अन्नपूर्णा” 2010 में अनंत आत्मबोध जागृति ट्रस्ट की प्रथम पहल के रूप में शुरू हुई। स्थापना से अब तक परियोजना का उद्देश्य “मानव सेवा माधव सेवा” सरल और निष्कपट रहा, भले ही लाभार्थियों की संख्या हर वर्ष बढ़ती रही।

“अन्नपूर्णा” वर्षभर चलने वाली सतत परियोजना है। इसके अंतर्गत 2010 से हर वर्ष खाद्य वितरण अभियान आयोजित किए जाते हैं। अभियानों की समय-सारिणी स्थानीय किसानों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की फसल-पद्धति व कृषि उत्पाद पर आधारित वित्तीय व खाद्य संकट को ध्यान में रखकर तय की जाती है। अब तक उत्तराखंड के विभिन्न भागों के छोटे/अल्प जोत वाले किसानों, बीपीएल, बेघर और प्राकृतिक आपदाग्रस्त परिवारों के लगभग 10 लाख लोगों को निःशुल्क भोजन मिला है।

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श्री विद्या

बालिका शिक्षा

“यदि आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं, तो आप केवल एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं। लेकिन यदि आप एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे राष्ट्र को शिक्षित करते हैं।” इसी प्रेरणादायी विचार के साथ, बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) परिवारों की बालिकाओं को कॉलेज/उच्च शिक्षा दिलाने हेतु ‘श्री विद्या’ पहल वर्ष 2017 में आरंभ हुई। इस योजना के अंतर्गत, आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आने वाली, परन्तु शिक्षा के प्रति गहरी लगन रखने वाली 8 बालिकाओं का चयन किया गया है। इन्हें नियमित छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाती हैं, जो न केवल ट्यूशन शुल्क बल्कि बोर्डिंग और लॉजिंग का पूरा खर्च वहन करती हैं—जब तक कि वे अपनी शिक्षा पूर्ण न कर लें।

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बाल विद्या

बाल शिक्षा

ग्रामीण भारत के बच्चों के लिए शिक्षा उनकी आर्थिक स्थिति और शहरी संस्कृति से दूरी के कारण अब भी चुनौतीपूर्ण है। “मजबूत भारत के लिए सबसे दूरदराज़ बच्चे को शिक्षित करें”—इस संकल्प के साथ ट्रस्ट की प्रारम्भिक गतिविधियों में “बाल विद्या” शुरू की गई। लक्ष्य हेतु स्थानीय शिक्षित व बेरोज़गार युवाओं को मानदेय पर शिक्षक नियुक्त किया गया। बीपीएल परिवारों के लगभग 150 बच्चों को निःशुल्क स्कूली शिक्षा दी गई।

समग्र विकास के लिए विद्यार्थियों को कंप्यूटर शिक्षा, खेल, योग और सांस्कृतिक गतिविधियों में सहभागिता हेतु प्रोत्साहित किया गया। नियमित उपस्थिति बढ़ाने के लिए प्रतिदिन निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया गया ताकि पोषण और शिक्षा—दोनों का ध्यान रहे। निजी स्कूल जैसा वातावरण और समानता का भाव बनाने हेतु यूनिफॉर्म, पुस्तकें व स्टेशनरी भी दी गई। यह परियोजना मार्च 2020 तक चली; COVID परिस्थिति के कारण अस्थायी विराम है, पर बच्चों का नियमित भोजन सुनिश्चित किया जा रहा है।

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स्त्री शक्ति

महिला सशक्तिकरण

महिलाओं का सशक्तिकरण ही ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण है। जब महिलाएँ आर्थिक गतिविधियों में जुड़ती हैं, तो परिवारों की प्रगति स्पष्ट दिखती है। इसी दृष्टि से 2017 में “स्त्री शक्ति” शुरू हुई।

ट्रस्ट द्वारा पूर्ण वित्त-पोषित पहला स्वयं-सहायता समूह 2017 में हरिद्वार के पात्री गाँव में 12 कृषक-महिलाओं के साथ बना। सिलाई का प्रशिक्षण व उपकरण उपलब्ध कराए गए। 2017-18 और 2018-19 में बीपीएल महिलाओं को डोरमेट और मोमबत्ती निर्माण का प्रशिक्षण भी दिया गया। प्रशिक्षण व 3 महीने के हैंड-होल्डिंग चरण के बाद महिलाएँ आत्मनिर्भर होकर ट्रस्ट परिसर में अपना उत्पादन केंद्र चलाने लगीं और उन्हें विपणन व बिक्री रणनीतियाँ सिखाई गईं। परियोजना 2019 तक चली।

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स्वाश्रिता

आत्मनिर्भरता और ग्रामीण रोजगार

असंगठित क्षेत्र से जुड़े परिवार अक्सर साहूकारों के कर्ज़ जाल में फँसकर आर्थिक कठिनाई में पड़ जाते हैं। पात्री, हरिद्वार में 2017 और 2019 में ऐसे 6 परिवार चिन्हित कर उन्हें गौ-पालन जैसे लघु उद्यम शुरू करने हेतु वित्तीय सहायता दी गई। इनमें से 4 परिवार आत्मनिर्भर हो चुके हैं और COVID महामारी के समय भी परिवार का निर्वाह सुचारु रूप से कर पाए।

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वृद्ध सेवा

वृद्धजन सहायता

हिमालयी पट्टी में स्थित उत्तराखंड में सर्दियाँ कठोर होती हैं, जिससे विशेषकर बेघर और बीपीएल वर्ग के वृद्धजन अधिक प्रभावित होते हैं। 2015 से हर सर्दी में ट्रस्ट हरिद्वार और आसपास झुग्गियों/झोपड़ियों में रहने वालों को गरम कंबल वितरित करता है। 2017 से 2020 के बीच हरिद्वार के आसपास के गाँवों में लगभग 40,000 ऊनी कंबल वितरित किए गए।

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आरोग्य क्रिया

चिकित्सा अभियान

2015 से ट्रस्ट हर वर्ष दो बार हरिद्वार के दुर्गम गाँवों में चिकित्सा शिविर आयोजित करता रहा है—विशेषकर वृद्धों और गर्भवती महिलाओं को जाँच के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके लिए ट्रस्ट देहरादून के संवेदनशील चिकित्सकों से समन्वय करता है, जो अनुरोध पर अपना कार्य-विराम लेकर सप्ताह-भर के शिविरों में जुड़ते हैं।

COVID-19 की शुरुआत पर 2020 में यह परियोजना विराम पर रही, पर 2020-21 में डॉक्टरों द्वारा COVID रोगियों को टेलीफोनिक सहायता, तथा सैनिटाइज़र व चिकित्सा-पूरक वितरण जारी रहा।

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हरिता आरण्य

सामाजिक वानिकी और जैव-विविधता

सतत कृषि के तीन मूलाधार हैं—पर्यावरणीय स्वास्थ्य, आर्थिक लाभप्रदता और सामाजिक समानता। हरिद्वार के अनेक किसान पारंपरिक/व्यावसायिक खेती में बाहरी रसायनों पर अधिक निर्भर हैं, जिससे पर्यावरण-अनुकूलता घटती है। बिना आर्थिक लाभप्रदता के प्राकृतिक कृषि प्रक्रियाओं को अपनाना कठिन होता है।

इसीलिए किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ अपनी भूमि में दीर्घकालीन, व्यावसायिक रूप से लाभकारी और पर्यावरण-अनुकूल वृक्ष/पौधे लगाने हेतु प्रोत्साहित किया गया। 2015 में आरम्भ “हरिता आरण्य” के तहत ऐसे पौधरोपण किए गए जो मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारें और फसल का पोषक-अवशोषण बढ़ाएँ। परियोजना आज भी जारी है—हरिद्वार से सटे “राजाजी राष्ट्रीय उद्यान” की वन-सीमाओं में पौधरोपण के साथ। जैव-विविधता बढ़ाने और किसानों के “सर्वश्रेष्ठ मित्र” गौरैया तथा टील, पिंटेल, पोचार्ड, रड्डी शेलडक, मैलार्ड जैसी प्रवासी पक्षियों की घटती आबादी सुधारने हेतु कृत्रिम घोंसले बनाकर पात्री क्षेत्र के वन व कृषि भू-भागों में लगाए गए।

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अक्षय पात्र

COVID-19 राहत

COVID-19 और उसके बाद के लॉकडाउन ने ग्रामीण आबादी को आर्थिक संकट में धकेल दिया। पोषण जैसी बुनियादी आवश्यकता जीवन-मरण का प्रश्न बन गई। इस संकट से निपटने के लिए “अक्षयपात्र” शुरू किया गया, जिसके तहत BPL परिवारों और फँसे प्रवासी श्रमिकों को भोजन उपलब्ध कराया गया। 2020 के लॉकडाउन के दौरान 7 लाख से अधिक लोग लाभान्वित हुए। 2021 में भी BPL परिवारों के घर-घर सूखा राशन पहुँचाकर यह कार्य जारी रहा।

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आत्म शुद्धि

सतत जीवन और आध्यात्मिक विज्ञान

शहरीकरण, घनीकरण और सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक, रोजगार, तकनीकी, स्वास्थ्य व शैक्षिक क्षेत्रों में बढ़ती उपभोग-प्रधान संस्कृति ने प्रकृति और मनुष्य के अंतरिक्ष के प्रति उपेक्षा बढ़ाई है। दूरदर्शिता के साथ साझा बुद्धि, जिम्मेदारी और कर्म—हर क्षेत्र में सतत वातावरण रचते हैं। इसके लिए शहरी-ग्रामीण जीवन के बीच की खाई पाटना आवश्यक है, ताकि मनुष्यता, संपदा और प्रकृति के प्रति उपेक्षा के स्थान मिटें।

इसी दृष्टि से शहरी युवाओं को देश-परिसर में ट्रस्ट के आध्यात्मिक गुरु के साथ “वॉक्स-एंड-टॉक्स” हेतु प्रेरित किया जाता है, ताकि वे बुज़ुर्गों की बुद्धि और प्रकृति की शिक्षाएँ आत्मसात कर सकें। 2012 में शुरू “आत्म शुद्धि” के अंतर्गत अब तक 6000+ शहरी परिवार, विशेषकर युवा, अधिक संतुलित व सतत जीवन की ओर अग्रसर हुए हैं।

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